डफली बजाए जा
डफली बजाये जा
‘भइया पूरे पचास रूपइया हैं रख लो, थोड़ी फुरसत मिली है, कुछ चाह-पान तो कर लूं।’ पान वाले को रूपया थमाकर , बिना किसी परवाह के रघुआ बढ़ गया था चाय की दूकान की तरफ। पूरा जिला मुख्यालय जायज, नाजायज विचारों से सराबोर था। नई पंचायती व्यवस्था के तहत् इस बार चुनाव हुए थे। आज चुनाव परिणामों की घोषणा का दिन था, आसमान में सूरज कुछ ऐसे ढंग से विलुप्त था कि मौसम उमस भरा होने के बजाए ठंडा हो गया था। चुनाव परिणामों की घोषणाओं को तीब्रतर बनाने वाले लाउडस्पीकर हालांकि ठीक-ठाक थे फिर भी भीड़ की आवाज, काना-फूसी और बतकच्चर को भेद नहीं पा रहे थे। रघुआ को मालूम था कि चुनाव परिणाम आज ही निकलेगा इसलिए बाजार में घूमना बेकार है।बाजार भी लगभग बन्द ही रहेगा।सो चला आया था मुख्यालय पर। दो-तीन बजे दिन तक कोई परिणाम नहीं घोषित हो पाया था, वह इधर-उधर नाचता रहा, डफली बजाता रहा। मुख्यालय पर लोग-बाग विभिन्न गोलों में बैठे नजर आ रहे थे, वह वहीं जाता और डफली बजाता, कितनों को अचरज होता उसके ‘कडे़’ की आवाज सुनकर , घंुघरू के स्वर की मधुरता से अपनापन बनाये रखने वाले तो बहुत थे वहां पर, पर ‘कड़ा’ भी दिल की गहराइयों में उतर कर आदमी को स्पन्दित कर सकता है और डफली की थापें मन को सम्मोहित कर सकती हैं, किसी को पता नहीं था। कड़े से निकलने वाली ध्वनियों की लयबद्धता, डफली पर पड़ने वाले पंजों की थापें, उस पर ‘आयल सुराज बाबू, आयल सुराज हो, अदमिन पर अदमिन कऽ देखऽ राज हो , कोई मरे बिना खाए, कोई खाय-खाय मरे, कोईकरे काम अउर कोई बिना काम रहे नचहीं के परी जब,नचाई समाज हो’ करमा की संवेदनशील धुनों के साथ इस नटुआ गीत की प्रस्तुति बरबस ही लोगों को ध्यान आकर्षित कर लेती थीं। रघुआ झूम-झूम कर गाता था, जब थकान महसूस होती थी तब मुख्यालय परिसर से बाहर निकल कर दण्डइत बाबा के पास वाले कुएं की जगत पर बैठ कर चीलम भर लेता था। ‘ आयल सुराज बाबू आयल सुराज हो’ गुनगुनाते हुए खोथड़ी में से गांजा की पुड़िया निकालता, गांजा हाथ में लेकर बीड़ी तोड़ता और उसकी सुरती गांजा में अनुपात से मिलाकर थोड़ा पानी का बूटा मारता उस पर, ‘जल न जाय, बन न जाय जल्दी से राख।’ उसे राख से चिढ़ थी, किसी जले हुए घर की राख हो, गांजा की राख हो, चाहे किसी कारखाने की। गांजा और बीड़ी की सुरती, भर गदोरी मल चुकने के बाद ‘बम-बम औघड़दानी बम-बम भोलेनाथ, बाबा विश्वनाथ रक्षा करऽ नाथ’ के उद्घोष के साथ पूरी गदोरी भर मला हुआ गांजा, चीलम में अंकड़ा डाल कर भर ः 107: देता फिर देखने लगता कोई राहगीर, जो आता और सुतरी के फाहे पर सलाई लगा देता। इधर रघुआ सटाक से एक ही सांस में पूरी आग भीतर खींचता, भर लेता मुंह भर गांजे का धंुआ। वही आग और धंुआ जिसे जनम के बाद से लगातार देखता आ रहा है रघुआ। पेट भर गांजे की धंुआ से भूल जाया करता है रघुआ कि उसका घर भी एक दिन अचानक भभक कर जला दिया गया था। माना गया था कि बरम बाबा का प्रकोप था। नाराज हो गए हैं बरम बाबा, क्यों नाराज हो जाया करते हैं बरम बाबाा या कि क्यों फटाफट चुनाव हुआ करते हैं- इन दोनों का उत्तर जानने की जिज्ञासा, रघुआ में न तो पहले ही थी और न ही अब है। रघुआ का घर उसकी शादी के तीन-चार साल बाद जला था, उसी साल शक्तिनगर की बिजली की चिनगारियों ने भी धुंआ उगला था। उसके पिता का जब देहान्त हुआ था तब शायद भयंकर अकाल पड़ा था पर मां के देहान्त के बाद तो उसने अपना कच्चा मकान ठीक-ठाक करा लिया था, फिर इुई थी शादी। बडे़ मजे में गुजर रहे थे दिन। पैसे की जब तंगी होती तो शक्तिनगर चला आता पत्नी के साथ। सात दिन बाद मजूरी मिलती और काम भर का अनाज-पानी , सर-समान खरीद कर वापस लौटा करता था रघुआ। हां रास्ते में जब वह देह दुखने, बदन तथा माथे से भयंकर दर्द होने की बात पत्नी से कहता तो वह समझ जाती कि आगे भट्ठी है..‘ दारू खरीदना ही पडे़गा’ इतना गिड़गिड़ाता रघुआ कि....उसकी पत्नी को खरीदना ही पड़ता दो पाकिट दारू। घर पर भी थोड़ी जमीन थी जिसमें साग-सब्जी और मकई की खेती कर लिया करता था रघुआ। इतनी खूबसूरत दुनिया में रघुआ के लिए दो ही प्रिय थे एक उसकी पत्नी और दूसरा उसका लोहबन्दा। लोहबन्दा जंगली बांस का था एक दम्म ठस्स और तांबे का छड़ उसपर ऐसा मोड़कर लगाया था हूरा पर कि हूरा की तरफ जैसे फनियर सांप की पूंछ हो और आगे की तरफ उसका फुुफकारता फन। कभी भी तेल की मालिश करना नहीं भूलता था रघुआ उस पर। तीन साल तक टांगे रह गया था चुल्हे के ऊपर छाजन में, धुंआ खिलाने के लिए। धुंआ ने बांस का रंग ही बदल दिया था, रिस रिस कर खैरहा बना दिया था एकदम चिकना। एक जगह छुओ तो हाथ सरक जाय दूसरी जगह । एक दो मौके आए भी थे जब रघुआ ने लोहबन्दा का इस्तेमाल किया था और अपनी सुरक्षा में सफल हुआ था। कभी भी अच्छे समय को न तो बैंक में जमा किया जा सकता है और न ही बुरे समय को दरिया में फेंका जा सकता है, तो समय ने पलटा खाया और रघुआ फूटी नाव की तरह जिन्दगी की तूफानी लहरों पर हिचकोले मारने लगा। रघुआ को मलेरिया ने कस कर जकड़ लिया था। सूई दवाई होने लगी थी। उसका काम पर जाना रूक गया था। अकेली पत्नी ही जाने लगी थी गांव वालों के साथ शक्तिनगर , एक दिन देर रात तक जब उसकी पत्नी ः 108: घर नहीं आई तब घबड़ाया था रघुआ... पड़ोसियों ने बताया था कि काम पर तो गई थी... इसके बाद फिर पता नहीं। इतनी समर्थ्य भी नहीं थी रघुआ मंे कि वह शक्तिनगर जाता और पता करता , पड़ोसियों के जरिए गांव में बात फैल गई थी। सब जानते थे कि रघुआ बीमार है। कुछ जागरूक और शुभचिन्तक दरवाजे पर आ गए थे रघुआ के। शक-सुबहा बहुमुखी हुआ करते हैं, सो कोई खास तथ्य नहीं पकड़ पा रहे थे लोग। कोई चाल-चलन भी खराब नहीं था उसकी पत्नी का कि लोग-बाग शक को फैलाकर भाग जाने की प्रक्रिया से जोड़ते। भगाई-कथा से भरा पटा है वह पूरा परिक्षेत्र। किसी की चर्चा किसी ठीकेदार से तो कोई ड्राइबर से... लड़कियां भाग जाती हैं या भगायी जाती रही हैं-गांववाले क्या पुलिस भी कभी ठीक से इस रहस्य कोनहीं खोलपाई। संशय, विस्मय और अनामंत्रित भय से आक्रान्त बैठे थे गांव के लोग, रघुआ के दरवाजे पर। किसम-किसम की भयावह घटनाओं के घटित होने की आशंका से कोई कुछ नहीं कह पा रहा था, सभी सूरज उगने की प्रतीक्षा मंे चुप-गुम-सुम बैठे-बैठे एक दूसरे के दिल दिमाग की परीक्षा ले रहे थे। सूरज की किरणें बंसवारी से छन कर जब गांव में आएगी तो हो सकता है अगला दिन शुभ समाचारों से भरा-पुरा हो, न भी होगा तब क्या। रघुआ जितना ठीक हुआ था बीमारी से फिर उतना बे ठीक हुआ जा रहा था। रघुआ जानता था अपनी पत्नी के बारे में कि किसी के साथ भाग जाने का सवाल ही नही, उसकी पत्नी ऐसा क्यों करेगी। बीते सालों में लौटने लगा था रघुआ। सुहागरात से लेकर आज तक कभी भी उसे आभास नहीं हुआ कि कहीं नफरत भी है उन दोनो में। दोनों साथ-साथ रहते काम करते, मिल-जुल कर एक दूसरे का दर्द बांटते। बच्चा पैदा न होने की चिन्ता उसकी पत्नी को थोड़ी अवश्य थी। कहती भी थी... ‘देखना डाक्टर तुम्हारे में ही कारण बताएगा, चारों तरफ मर-मनौती तो कर ही चुकी हूं... बरम बाबा की पुजहाही में एक पियरी धोती चढ़ा दिया है ,अब तो बरम बाबा का भी कोई कारण नहीं रह गया है।’ कुछ कमाई-धमाई हो जाने के बाद ही डाक्टरी जांच करवानी थी निश्चित कर लिया था दोनों ने। गांव में साल-दो साल तक बच्चा पैदा न हो तो बवाल खड़ा हो जाता है, सुबह उठते ही बिना बच्चे वाली औरत का मुंह देखना अपशकुन माना जाता है। रघुआ की पत्नी जानती थी कि जैसा उसकी विधवा मौसी के साथ होता है वैसा ही तो मेरे साथ भी होगा। सो जल्दी में थी... पैसा इक्टठा हो जाय फिर डाक्टरी जांच। सब कुछ धरा केे धरा रह जाएगा शायद... सोचता रहा रघुआ ‘जाने किस हाल में हो उसकी पत्नी।’ तभी पक्की सड़क से एक गाड़ी रोशनी फेंकने लगी थी रघुआ के दरवाजे पर। कैसे आई और कैसे मुड़ कर चली गई तथा धम्म से क्या गिरा, कुछ नहीं समझ पाए थे दरवाजे पर बैठे हुए लोग। जब ः 109: देखते हैं तो दंग रह जाते हैं, ननकेसरी थी, रघुआ की पत्नी। सांस चल रही थी, मरी नहीं थी, कपड़े फट गए थे, छिल गई थी पूरी देह , हांफ रही थी बेदम। अगल-बगल की औरतें भी आ गई थीं फिर आतंककारी रहस्य पसर गया था सबके चेहरे पर, जिन्दगी की सुखद संभावनाएं नष्ट हो गईं थीं। जुल्म, गाड़ी से आया था, गाड़ी से फुरर्र हो गया था, ननकेसरी को हांफता दम घुटता छोड़कर।स्त्री-पुरूष केसंबन्धों की पवित्रता को ताकत से रौंद कर चले गए थे गाड़ी वाले लोग। गांव में जो संभव था, उसी हिसाब से दवा-दारू की गई थी। ननकेसरी सुबह होते-होते कुछ-कुछ बोलने लगी थी, हाथ पैर हिलाने लगी थी, औरतें समझ रही थीं मर्द भी शायद... कमीनेपन की हद पार कर जाता है नर। आंगन में दाना चुगती गोरैया पर इस घटना का कोई असर नहीं था। सब जानते हैं कि गोरैया जाने कितनी बार एक दूसरे को चाटते-चूटते रहते हैं पर आदमी तो आदमी है, कोई गोरैया या कुत्ता नहीं, कुछ तो फर्क हो चिड़िया और आदमी में, ननकेसरी की हालत ने रघुआ को बीमारी से मुक्त कर दिया था। उसके जेहन में उसका लोहबन्दा ही मार करता-वांछित का सिर फोड़ता दीख रहा था..‘थोड़ा ठीक तो हो जाय ननकेसरी’ ननकेसरी पहचानती जरूर होगी, नया होगा तो भी पहचान लेगी ही। सब कुछ साफ-साफ बता देना चाहिए ननकेसरी को, पर हो सकता है, औरत जात है, औरतें बहुत कुछ छिपा ले जाती हैं, कहां बताती हैं अपनी मां बाप तक से भी कि, भीड़ में कौन सट कर बैठना चाहता था, कैसे घूर रहा था कोई, या कि गोदी में लिए हुए लड़के को देते समय कैसे छू गई थी उंगलियां, वहां जहां सिर्फ पति की उंगलियां ही पहुंच सकती हैं। कई तरह के अन्तविरोधों से जकड़ता जा रहा था रघुआ। उसे प्रतीक्षा करनी ही थी ननकेसरी के ठीक होने तक। ननकेसरी के ठीक होने तक रघुआ पूर्ण रूप से ठीक हो गया था। लोहबन्दे पर तेल लगाना शुरू कर दिया था। ननकेसरी ने ठीकेदार का नाम बता दिया था रघुआ को, लेकिन तीन-चार लोग और भी थे उसके साथ। बताते-बताते रोने लगी थी ननकेसरी, ‘अब क्या बचा है’ का रट लगाए हुए थी, रघुआ अपनी कसम दिलाकर चुप करा दिया था ननकेसरी को। ननकेसरी खामोश तो हो गई थी बाहर से पर भीतर से छोड़ चुकी थी जीने की चाहना। ननकेसरी पर समझाने-बुझाने का इतना ही असर पड़ा था कि वह गुम-सुम रहने लगी थी, और सोचने लगी थी कि ठीकेदार को फिर क्यों जीना चाहिए ? रघुआ के एक ही लोहबन्दे से धराशाही हो गया था ठीकेदार, दूसरा बजते ही दम टूट गया था, झूल गई थी खोपड़ी, हल्ला गुल्ला ,चीख सुनकर ठीकेदार का दरबान निकल आया था बाहर। रघुआ ननकेसरी को लेकर भाग जाता पर ठीकेदार को मूत पिलाने की कसम खाई थी ननकेसरी। ः 110: उसी में देरी हुई... हाते की ऊंची दीवार फांदनी थी, रघुआ ने ननकेसरी को ज्यों ही फदाया था दीवार, उस पर लगा लोहे का एक भाला बुरी तरह धंस गया था ननकेसरी के पेट में, निकालने की हड़बड़ी में ननकेसरी और बुरी तरह फंस गई थी उसमें, फिर देखा था रघुआ ने कि ननकेसरी ने इशारे से भागने के लिए कहा था रघुआ से... बस इशारा कर पाई थी फिर वहीं लटके-लटके दम तोड़ दिया था..। रघुआ भागा था बहुत तेज-बहुत तेज। मर-मुकद्मा चला था... रघुआ को आजीवन कारावास हो गया था। सजा समाप्त होते ही छूट कर गांव गया था रघुआ, वहां कोई पहचान नहीं पाया था रघुआ को, जो बच्चे गोदी में थे वे जवान हो गए थे तब तक। जो जवान थे मरने काबिल। उसका घर गिराया जा चुका था, बगल में पेट्रोल पम्प खुल गया था। उसी मृत हत्यारे ठीकेदार का लड़का मालिक था पेट्रोल पम्प का। गांव में कौन रोकता उसकों, रघुआ को सजा मिलते ही उसने उसका घर पहले तो जलवाया बाद में गिरवा दिया था और कागज में अपना नाम करवा लिया था। ऐसा नहीं था कि गांव में रघुआ का कोई मित्र नहीं था, अगल-बगल रिश्तेदार नहीं था, पर कौन अपने सिर बवाल लेता, सामने ठीकेदार का जीवित लड़का था ताकतवर, पैसा वाला और रघुआ के मित्र तथा रिश्तेदार सब गरीब, आकांक्षाहीन, टूटे हुए और जड़। भला कौन चाहेगा रघुआ बनना? ‘कौन सी बात थी ?’ यही न कि ठीकेदार ने गड़बड़ किया था ननकेसरी के साथ, तो क्या हो गया था, आसमान थोड़े गिर गया था... दवा-दारू हो ही गई थी, ठीक हो गई थी ननकेसरी ,फिर ठीकेदार की हत्या करने की क्या जरूरत थी ? ननकेसरी भी तो भाले में फंस कर मर ही गई थीं ना। अरे वही होगा जो परमात्मा चाहेगा। सामाजिक अन्तर्विरोधों में उपजी जडताएं व्यक्ति को क्या पूरे समाज को जड बना देती हैं। प्रतिक्रियाहीन, आकांक्षाहीन। सारी संभावनाएं नष्ट हो जाया करती हैं, और ऐसा ही हो गया था रघुआ के जेल जाने के बाद उसके गांव में। सब रघुआ पर दोष मढ़ने लगे थे... ‘ बड़ों से लड़ने का यही फल होता है, गिर गया न पूरा घर-बार , न नाम लेवा न पानी देवा’ अपनी लम्बी दाढ़ी और लम्बे बालों पर हाथ फेरते हुए लौट गया था गांव से रघुआ। रास्ते में ख्याल आया था ननकेसरी के साथ ही लोहबन्दे का। मुड़ गया था उस खोह की तरफ जहां फेका था उसने। कटीली झाड़ियां तथा झंखाडो़ं से घिरी थी वह जगह, घन्टों लग गये ढंूढ़ने में, कहीं नहीं दिखा था लोहबन्दा , इतना तो रघुआ भी जानता था कि बांस तो सड़ गया ही होगा पर वह तांबे का फन मिलना चाहिए। नहीं मिला था वह भी। जाने कहां-कहां घूमता रहा था रघुआ। कभी बनारस तो कभी इलाहाबाद तो कभी हरिद्वार और अयोघ्या भी। अयोध्या में जब बवाल मचा था उसके ठीक दो दिन पहले वहां से निकल गया था रघुआ, नहीं तो जाने क्या होता? ः 111: बहुत ही निराश और हताश होकर लौटा था रघुआ गांव से, पूरा जीवन गांव में खपा देने की चाहना से वह गांव गया था, पर वहां पूरे गांव में उसके प्रति घृणा ही घृणा थीं हर तरफ। लौटते समय अपनी सारी चाहनाओं को फेंक दिया था उसने बेतहा नाले में, जिसके किनारे बरम की चौरी थी और गरियाया भी खूब था. उन्हें ‘कहां गए बाबा नहीं देखते कि मेरे साथ क्या क्या हुआ? मैंने गलत नहीं किया न ठीकेदार को मार कर, तुम भी पंडित थे, हमारे पूर्वजों ने निश्चित ही मजबूर होकर तुम्हारी हत्या की होगी, मेरी तरह.. पहले तो तुम अकेले ही कम नहीं थे अत्याचार के लिए, अब दो हो गए हो मजे में कटेंगें तुम्हारे दिन।’ बड़ी तीखी हंसी हंसते हुए खखारा था रघुआ और चल दिया था वहां से। जगह-जगह घूमते-घूमते रघुआ मुख्यालय पर चला आया था , अपनी पुरानी जान पहचान की जगह पर। शक्ल सूरत में इतना अन्तर आ गया था और बीस-पच्चीस साल गुजर भी गए थे, कौन पहचानता रघुआ को। गांजा का नशा चढ़ते ही वह कुएं की जगत से उठा और चीलम वगैरह सहेज कर झोले में डाल लिया। नाचते-फुदकते, डफली बजाते मुख्यालय की तरफ बढ़ने लगा। इधर चुनाव परिणाम आने आरम्भ हो गए थे। लोग-बाग अपने जीते प्रत्याशी को माला-फूल से लादते, नारा लगाते और रघुआ डफली बजाता नाचता,‘आयल सुराज बाबू आयल सुराज हो’ गाता, जीते हुए प्रत्याशी के आगे-आगे चलता, मुख्य सड़क तक भीड़ के साथ वह भी भीड़ में खो जाता। बाहर निकलते ही भीड़ की शक्ल बदल जाती... लोग गाड़ियों में सवार हो जाते या पैदल ही चल देते। कुछ प्रत्याशियों का जुलूस शहर की तरफ भी बढ़ता पर सबको रघुआ परिसर के बाहर आकर छोड़ देता। मांगता किसी से कुछ नहीं उसे जो मिल जाता सलाम करते हुए टेक लेता और कुर्ती के जेब में रख लेता। जब रूपया अधिक हो जाता तो पान वाले के यहां जमा कर देता। फिर इन्तजार करने लगता दूसरे जीते प्रत्याशी का। सत्तर अस्सी रूपए के आस-पास जमा हो गए थे उसके पास । सो रघुआ पान वाले के यहां जमा करने चला गया था। उधर लाउड स्पीकर ने जोरदार आवाज किसी प्रत्याशी की जीत का उगला। भागा रघुआ बहुत तेज... बहुत तेज , उतना ही जितनी तेज भागा था ठीकेदार की हत्या के बाद । जीता हुआ प्रत्याशी घिरा था लोगों से ,रघुआ लगा डफली बजाने, नाचने गाने ... ‘ आयल सूराज बाबू आयल सुराज हो’ जीता हुआ प्रत्याशी रघुआ की तरफ मुड़ा, रघुआ ने देखा। प्रत्याशी ने भी उसे देखा पर प्रत्याशी क्या पहचानता रघुआ को, रघुआ पहचान गया था, वह ठीकेदार का लड़का था। रघुआ ने बन्द कर दिया था नाचना, डफली बजाना, और चल दिया था वहां से..। लोगों ने बार-बार कहा था, मनाया था। इतना ही नहीं कुछ जबरी भी करना चाहा था तब खिसिया कर फोड़ दिया था डफली को ही रघुआ ने, और फेंक दिया था एक तरफ। चकरा गया था पान वाला,‘आखिर ऐसा क्यों किये दादा ? क्यों फोड़ दिया तुमने डफली, तोड़ दिए कडे़, अब भी तुम्हारी सांसे फूल रही हैं ’ कुछ नहीं बोला था रघुआ। लगा था भरने चीलम। shivendra
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