डफली बजाए जा
डफली बजाये जा ‘भइया पूरे पचास रूपइया हैं रख लो, थोड़ी फुरसत मिली है, कुछ चाह-पान तो कर लूं।’ पान वाले को रूपया थमाकर , बिना किसी परवाह के रघुआ बढ़ गया था चाय की दूकान की तरफ। पूरा जिला मुख्यालय जायज, नाजायज विचारों से सराबोर था। नई पंचायती व्यवस्था के तहत् इस बार चुनाव हुए थे। आज चुनाव परिणामों की घोषणा का दिन था, आसमान में सूरज कुछ ऐसे ढंग से विलुप्त था कि मौसम उमस भरा होने के बजाए ठंडा हो गया था। चुनाव परिणामों की घोषणाओं को तीब्रतर बनाने वाले लाउडस्पीकर हालांकि ठीक-ठाक थे फिर भी भीड़ की आवाज, काना-फूसी और बतकच्चर को भेद नहीं पा रहे थे। रघुआ को मालूम था कि चुनाव परिणाम आज ही निकलेगा इसलिए बाजार में घूमना बेकार है।बाजार भी लगभग बन्द ही रहेगा।सो चला आ...